Soil Bio Nutrient क्या हैं और इसका खेती में प्रयोग 
Bio Soil Nutrient | जैविक मृदा उर्वरक 


जैविक रूप से भूमि की उर्वरक क्षमता बढ़ाने के लिए  Soil Bio Nutrient का प्रयोग करना चाहिए , क्योकि  इसके प्रयोग से हानिकारक कीट बीमारी को आसानी से  कंट्रोल किया जा सकता , साथ ही साथ मिट्टी की स्वस्था को भी बेहतर  रखा जा सकता हैं , Bio soil  nutrient का प्रयोग करने से फसल की गुणवत्ता में सुधार  होता  हैं और कम लगत में अधिक वा अच्छी  फसल लिया जा सकता हैं , जिसका बाजार भाव भी अच्छा मिलता  , अब सरकार भी जैविक खेती करने के लिए प्रोत्सहन कर रहा हैं |

कार्बनिक खाद , या जैविक पदार्थो से निर्मित उर्वरको का प्रयोग करने से मिट्टी द्वारा उत्पन्न होने वाले हानिकारक कीड़ो के जीवन जीवन चक्र पर  बुरा प्रभाव डालता हैं जिससे इन कीटो की संख्या में कमी आता  हैं और फसल सुरक्षित हो जाता हैं | 
इसी प्रकार से मृदा जनित बीमारी का भी अंत हो जाता हैं ,  इस प्रकार से कीट, बीमारी को नियंत्रित करने के लिए हानिकारक रासायनिक दवाओ का प्रयोग  करना नही पड़ता जिससे एक तरफ तो किसानो की पैसे बचते ही हैं   साथ में लाभदायक जीव जंतु को भी बचाते हैं जो फसलो को नुकसान पहुचने वाले कीड़ो को खा कर नस्ट करते हैं, किसान जब फसल उगाने के लिए रासायनिक खाद जैसे की , सुपर फास्फेट , यूरिया , DAP आदि का प्रयोग करता हैं ,तो इससे फसल बहुत अच्छे से कम समय में विकास तो कर लेता हैं लेकिन , कीट बीमारी की मार को सहन करने की क्षमता बहुत कम होता हैं जिससे किसान दवाई खरीदने के लिए अतरिक्त पैसे खर्च करता हैं , 
इसके अलावा रासायनिक खाद या उर्वरक मिट्टी को नीचे से  कड़ा कर देता हैं जिसके कारण जमीन के अन्दर पानी का रिसाव बंद होने लगता हैं , खेत से पैदा होने वाले फसल में उन प्रयोग होने वाले उर्वरक का अंश भी रह जाता हैं जो खाने वाले के अंदर जा कर शारीर में कई बीमारी को जन्म दे देता हैं | 

Bio soil Nutrient क्या हैं ?

Bio Soil Nutrient ,जैविक पदार्थो से बनाया गया उर्वरक हैं जो भूमि की उर्वरक क्षमता को बढ़ता हैं , मृदा की भौतिक, जैविक , गुणवत्ता को बेहतर बनाता हैं , जिससे मिट्टी में जल धारण करने की क्षमता बढ़ता हैं , मिट्टी में लाभकारी जीवो की संख्या में बढ़ोतरी होता हैं , जो किसी भी फसल को उगाने के लिए उपयुक्त होता हैं | 

जैविक उर्वरक और जैविक खाद में अंतर 

 जैविक उर्वरक , जैविक पदार्थो को संश्लेषित करके बनाया जाता हैं , जो तरल और ठोस दोनों अवस्था में हो सकता हैं , जबकि जैविक खाद , जीवो के अवशेष या पदार्थो को गढ़े में सडा कर बनाया जाता हैं जो ठोस रूप में होता हैं जैसे की गोबर की खाद , कम्पोस्ट की खाद , केचुए की खाद और इसे प्रयः फसल बोने के पहले ही खेत में डाला जाता हैं  |

जैविक उर्वरक को, जैविक खाद के साथ मिलाकर भी खेत में डाल सकते हैं और खड़ी फसल में भी छिडकाव कर सकते हैं , किन्तु खड़ी फसल में छिडकाव करने के लिए , स्प्रे या अन्य जैविक खाद जैसे की केचुए की खाद में मिलाकर प्रयोग किया जाता हैं , इसके अलावा कई ऐसे जैविक उर्वरक भी हैं जिसे यूरिया ,DAP के साथ भी मिलाकर प्रयोग किया जा सकता हैं |

प्रमुख जैविक उर्वरक :-

 

Soil Bio Nutrient Gold

प्रयोग विधि :-

यह उर्वरक  घोल के रूप में आता हैं, जो  पौधों के लिए जरुरी NPK पोषक तत्व की कमी को पूरा करने में सक्षम हैं | जो वनस्पति में सुधार करने के साथ ही साथ पादप प्रजनन की क्रिया को बढ़ाता हैं , इसका प्रयोग फसल के किसी भी अवस्था में तथा लगभग सभी प्रकार की फसल में किया जा सकता हैं | 2 ml को एक लीटर पानी में घोल कर के  छिडकाव किया जाता हैं , यह क्रिया 15 दिन के अंतरल पर दोहरा दे इससे इसका रिजल्ट अच्छा आता हैं | 

फायदे :-

यह वनस्पति विकास विशेष रूप से पत्ते , तना , शाखाओं और पत्तियों को पीला होने से रोकता हैं | जड़ वृद्धि बीज अंकुरण और फुल को उतेजित करता हैं | इसके अलावा यह रोग प्रति रोधक के साथ साथ मिट्टी की जलधारण क्षमता को बढ़ाता हैं मिट्टी को मुलायम बनाता हैं ,पौधे में आवश्यक प्रोटीन बनाने में मदद करता हैं जिससे अधिक संख्या में फुल फल लगते हैं |

Soil  Black  Bio Nutrient


प्रयोग विधि :-

यह उर्वरक ठोस रूप में आता हैं जो चाय पत्ती के सामान काला दिखाई देता हैं , इसमें 95% ह्यूमिक एसिड तथा 5 % फेल्विक एसिड  तथा 60 प्रकार के एक्टिव बायो सूक्ष्म तत्व होता हैं , जो  पानी में शीघ्र घुलनशील होता हैं , जिससे यह नमी मिलते ही घुल जाता हैं , इस उर्वरक को जैविक खाद वा रासायनिक की किसी भी खाद में मिलाकर, वा कीटनाशक दवाई में मिलाकर , या फिर टपक सिचाई के माध्यम से  फसल की किसी भी अवस्था में  किया जा सकता हैं, इसके अलावा इसे .0.5-1 ग्राम मात्रा को एक लीटर पानी में घोल करके खाड़ी फसलो में छिडकाव कर सकते हैं , तथा इसका उपयोग सभी प्रकार की फसल में किया जा सकता हैं | यह उर्वरक 50 -100 ग्राम एक एकड़ के लिए पर्याप्त होता हैं |

फायदे :-

मिट्टी की सरचना में सुधार करता हैं व जल धारण क्षमता को बढ़ाता हैं  पौधों में बीज अंकुरण की क्षमता को बढ़ाता हैं एवं जड़ो का शीघ्र विकास करता हैं ,जिससे पोषक तत्वों के केटायन एक्सचेंज कैपेसिटी को बढाकर पोषक तत्वों को कम समय में पौधों के सभी भागो में फैलाता हैं , लाभकारी जीवाणु एवं तत्वों को आलेट्रावाईलेट किरणों द्वारा होने वाले विघटन से बचाता हैं , पौधों में रोग एवं किटो की प्रति प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता हैं , इस उर्वरक से फसलो की भंडारण क्षमता में बढ़ोतरी होता हैं |


Bio Flowering Agent

प्रयोग विधि :-

पॉवर नाम का यह बायो प्रोडक्ट घोल के रूप में आता हैं जो  पौधों में फूलो की संख्या में का विकास करता हैं , तथा इसका प्रयोग लगभग सभी प्रकार की फसलो में छिडकाव के माध्यम से किया जा सकता हैं , छिडकाव करने के लिए 1.5 ml उर्वरक को 1 लीटर पानी के हिसाब से घोल तैयार करे और इसे फसलो में कम से कम 7-8 दिन और अधिकतम 15-20 दिन के अंतर में 3 छिडकाव करे , अधिकाश कीटनाशक के साथ प्रयोग कर सकते हैं  |

फायदा :-

पावर, क्लोरोफिल संश्लेषण में सुधार करता हैं जिससे पौधों का समग्र विकास होता हैं , फुल और फल को गिरने से रोकता हैं तथा बीजो का अंकुरण क्षमता में सुधार होता हैं , अनाज ,तिलहन वा समस्त बीज वाली फसल में   पोचे दाने को कम करता हैं , जिससे अधिक उपज होता हैं , दाना चमकदार और वजनदार होता हैं |


Josh B5 Bio Insecticide वा flowering Agent

प्रयोग विधि :-
यह बायो एजेंट घोल के रूप में आता हैं जिसका प्रयोग खड़ी फसल में छिडकाव के माध्यम से किया जाता हैं , यह फसलो की फुल, फल को बढ़ाने के साथ कीड़ो को भी मारने की क्षमता रखता हैं  , तथा लबे समय तक कीड़ो के आक्रमण से फसलो को बचाता हैं | इसका प्रयोग सभी फसलो में, फसल के किसी भी अवस्था में किया जा सकता हैं | 2 ml दवा को एक लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर 3-4 बार 15 दिन के अन्तराल में  छिडकाव करे 

फायदा :-
इसके प्रयोग से पोषक तत्वों का फसल दुवरा अच्छी तरह से उपयोग होता हैं . फसल में हानिकारक किट समाप्त होते हैं तथा फसल की प्रति रोधक क्षमता बढती जिससे किटो के हमले के खिलाफ फसल का रक्षा तंत्र सक्रीय होता हैं , फुल की संख्या और फल धारण करने की क्षमता प्रभावी रूप से बढता हैं | तथा उच्च गुणवत्ता वाली उपज प्राप्त होता हैं .

इसके अलावा भी कई Soil Bio Nutrient हैं जिसका काम ऊपर उलेख किये गए बायो प्रोडक्ट के सामान ही हैं तथा उपयोग या प्रयोग विधि भी सामान हैं .


 



Cultivation Of Tomato 


 टमाटर की जैविक उन्नत खेती ,टमाटर उष्णकटिबंधीय जलवायु की फसल है, इसके पौधे सर्दी और गर्मी दोनों मौसम में आसानी से विकास कर लेते हैं. लेकिन सर्दियों में पड़ने वाले पाले से , पौधे शीघ्र नष्ट हो जाते है. टमाटर की खेती में लगातार इस्तेमाल किये जाने वाले रासायनिक कीटनाशक और उर्वरक की वजह से इसके फलों की गुणवत्ता कमी हुई हैं , जिसके कारण टमाटर  के अधिक प्रयोग को रोग उत्पन्न करने वाले कारक  के रूप में देखा जा रहा हैं , जैसे की पत्थरी , 

·         टमाटर के प्रमुख उपयोग

·         टमाटर खाने के फायदे

·         टमाटर के प्रमुख प्रकार और किस्मे

·         घरेलु उपयोग के लिए टमाटर उगाने के उन्नत तरीके

·         वाव्सयिक खेती करने के लिए उन्नत तकनिकी जानकारी

·         टमाटर की उन्नत खेती और लाभ

·         टमाटर की खेती से अधिकतम लाभ कमाने के लिए सुझाव  

 

 

टमाटर की जैविक खेती आज के समय की आवश्यकता है, क्योंकि टमाटर खपत और उत्पादन की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण सब्जी की फसल है। जिसका सीधा सम्बन्ध मानव स्वस्था से  है,  टमाटर की  खेती लगभग पुरे देश में की जाती है, जबकि आंध्रप्रदेश  सबसे अधिक टमाटर उत्पादन करने वाला राज्य हैं , टमाटर की मांग साल भर रहती है। और खेती भी पुरे साल भर किया जा सकता हैं। 

टमाटर के प्रमुख उपयोग :-

टमाटर ही शायद एक ऐसी फल या सब्जी है, जिसे विश्वव्यापी मान्यता प्राप्त है।  लाल-लाल टमाटर देखने में सुंदर और खाने में तो स्वादिष्ट होता  हैं, साथ ही इनमें बहुतायत में पौष्टिक गुण भी पाए जाते हैं।टमाटर का प्रयोग  सलाद व सब्जी के लिए सबसे ज्यादा होता हैं ,आज लोग घर या रेस्टोरेंट या कंही भी खाने की स्वाद को बढ़ाने के लिए टमाटर का उपयोग करते ही  हैं , खाने में टमाटर का उपयोग स्वाद को बढ़ता ही हैं साथ में , टमाटर में भरपूर मात्रा में कैल्शियम, फास्फोरस व विटामिन सी व ए पाये जाते हैं जो हड्डी दांत व आँखों के लिये बहुत लाभकारी है। एसिडिटी की शिकायत होने पर टमाटरों की खुराक बढ़ाने से यह शिकायत दूर हो जाती है। हालाँकि टमाटर का स्वाद अम्लीय (खट्टा) होता है, लेकिन यह शरीर में क्षारीय (खारी) प्रतिक्रियाओं को जन्म देता है।  टमाटर की  खट्टे स्वाद का कारण साइट्रिक एसिड और मैलिक एसिड  है जिसके कारण यह प्रत्यम्ल (एंटासिड) के रूप में काम करता है। टमाटर का उपयोग सब्जी के स्वाद  को बेहतर बनाने के अलावा  टमाटर की सूप बनाने में  चटनी बनाने में , सलाद बनाने में  सॉस बनाने में ,  कैचअप बनाने में  , अचार बनाने में तथा जूस के लिए के , इसके अलावा नमकीन बनाने में  भी  बड़ी मात्रा में उपयोग किया जाता है, जिसका उपयोग लम्बे समय तक रखने व  पुरे साल भर कई प्रकार की पकवान के साथ किया जा सकता  हैं। इसके अलावा सौंदर्य प्रसाधन के सामग्री बनाने में भी टमाटर रस का प्रयोग होता हैं। 


टमाटर खाने के फायदे 

शरीर के लिए टमाटर बहुत ही लाभकारी होता है। इससे कई प्रकार की रोगों का निदान होता है। टमाटर शरीर से विशेषकर गुर्दे से रोग के जीवाणुओं को निकालता है। यह पेशाब में चीनी के प्रतिशत पर नियन्त्रण पाने के लिए प्रभावशाली होने के कारण यह मधुमेह के रोगियों के लिए भी उपयोगी होता है। कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम होने के कारण इसे एक उत्तम भोजन माना जाता है। टमाटर से पाचन शक्ति बढ़ती है। इसके लगातार सेवन से जिगर बेहतर ढँग से काम करता है और गैस की शिकायत भी दूर होती है। जो लोग अपना वजन कम करने के इच्छुक हैं, तो उनके लिए टमाटर बहुत उपयोगी है। एक मध्यम आकार के टमाटर में केवल 12 कैलोरीज होती है, इसलिए इसे पतला होने के भोजन के लिए उपयुक्त माना जाता है। इसके साथ साथ यह पूरे शरीर के छोटे-मोटे विकारों को भी दूर करता है। टमाटर के नियमित सेवन से श्वास नली का शोथ कम होता है। प्राकृतिक चिकित्सकों का कहना है कि टमाटर खाने से अतिसंकुचन भी दूर होता है और खाँसी तथा बलगम से भी राहत मिलती है।  अधिक पके लाल टमाटर खाने वालों को कैन्सर रोग नहीं होता। खाली पेट प्रतिदिन एक गिलास टमाटर का रस पीने से त्वचा का रंग गोरा होने लगता हैं खासकर चेहरे पर चमक बढ़ जाता हैं। इसके आलावा एक चमच हल्दी दो चमच बेसन, आधा चमच नीबू रस तथा एक से दो टमाटर का रस को पेस्ट बना ले और फिर इसे चेहरे पर लगाए इससे चेहरे की दाग , कील मुँहासे दूर हो जाते हैं  , लेकिन ध्यान रहे यदि टमाटर जैविक खाद ,कीटनाशक का उपयोग करके उगाया गया हैं तो यह जूस या रस पीने के लिए अति उत्तम होता है। 

टमाटर के प्रमुख प्रकार और किस्मे :-

टमाटर मुख्य रूप से दो प्रकार का होता हैं पहला चेरी टमाटर और दूसरा सामान्य टमाटर जो आमतौर पर सबसे ज्यादा उपयोग किये जाते हैं। 

चेरी टमाटर की उत्पादन सामान्य टमाटर से कई गुना अधिक होता हैं तथा इसका पोषक गुण भी सामान्य टमाटर से अधिक होता हैं ,चेरी टमाटर की मीठास सामान्य टमाटर की तुलना में ज्यादा होती है. इसमें 9.4 टीएसएस है, जबकि सामान्य टमाटर में टीएसएस 3.5 तक होता है. चेरी टमाटर में बीज और रस की मात्रा काफी कम होती है, इसमें विटामिन ए व लाइकोपीन प्रचुर मात्रा में पाई जाती है. यह टमाटर लाल, गुलाबी और पीले रंग में होता है, चेरी टमाटर की खेती इन दिनों किसानों के बीच काफी लोकप्रिय हो रही है चेरी टमाटर का प्रयोग ज्यादातर फाइव स्टार होटलों में सलाद के तौर पर किया जाता है. लेकिन अब इसमें ऐसी किस्मों का विकास हो रहा है जिसको आम लोगों की थाली तक भी पहुंचाया जा सकता है।  हांलाकि इसकी खेती के बारे में बात करें तो  इसे पॉलीहाउस में उगाया जाता है।  जिससे एक बार रोपाई करने के बाद पुरे साल भर फल लिया जा सकता हैं , हलकी चेरी टमाटर को घर की जरुरत को पूरा करने के लिए  गमलो में लगया जा सकता हैं , चेरी टमाटर की पौधे की लाबाई बहुत अधिक होता हैं यह 10-15 मीटर तक होता हैं , और फल लम्बे गुच्छो में लगते हैं। 

चेरी टमाटर के लिए प्रमुख किस्म हैं :

Red Cherry :- यह किस्म पंजाब खेतीबाड़ी यूनिवर्सिटी द्वारा तैयार की गई है। इस किस्म को खास सलाद के लिए प्रयोग किया जाता है। इसका रंग गहरा लाल होता है और भविष्य में यह पीले, संतरी और गुलाबी रंग में भी उपलब्ध होगी। इसकी बिजाई अगस्त या सितंबर में की जाती है और फरवरी में यह कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह जुलाई तक पैदावार देती है। इसकी अगेती पैदावार 150 क्विंटल प्रति एकड़ और कुल औसतन पैदावार 430-440 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

Sona Cherry:- यह किस्म 2016 में जारी की गई है। इसकी औसतन उपज 425 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। इसके फल पीले रंग के और गुच्छों में निकलते हैं। फल का औसतन भार लगभग 11 ग्राम होता है। इसमें सुक्रॉस की मात्रा 7.5 प्रतिशत होती है।

Kesari Cherry: यह किस्म 2016 में जारी की गई है। इसकी औसतन उपज 405 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। इस किस्म के फल का औसतन भार लगभग 11 ग्राम होता है। इसमें सुक्रॉस की मात्रा 7.6 प्रतिशत होती है।


                    

सामान्य टमाटर :-
सामान्य टमाटर की खेती देश भर में बड़ी मात्रा में किया जाता हैं , तथा पुरे दुनिया में  टमाटर उत्पादन के लिए चीन के बाद भारत का नंबर आता हैं  जिसमे सबसे ज्यादा उत्पादन देने वाला राज्य आंध्रप्रदेश हैं जबकि मध्यप्रदेश तीसरे सबसे अधिक टमाटर उत्पादन करने वाला राज्य हैं, भारत से विदेशो को भेजे जाने वाला टमाटर में सामान्य टमाटर का बड़ा योगदान हैं  जिससे करोडो रूपए की विदेशी मुद्रा प्राप्त होता हैं। सामान्य टमाटर की दो प्रजाति है पहला देशी और दूसरा हाइब्रिड या संकर इनकी प्रमुख किस्म की बात करे तो 
देशी में - 
पूसा सदाबहार :- इस किस्म की  औसत उपज लगभग  300 क्विंटल प्रति हैक्टेयर  से लेकर  150 -200 क्विंटल प्रति एकड़ तक हो सकता  हैं |  पौधा फुल देने बाद पौधों में बढाव नही होता हैं पौधा-बौना फल-गोल,छोटा चिकना आकर्षण लिये हुये, ठंडा और गर्म, वातावरण के लिये उपयुक्त हैं  इस किस्म की रोपाई के  55 दिन बाद पहली तुड़ाई के लिए शुरू हो जाता हैं। 

स्वर्ण लालिमा :- फल गहरे लाल, गोल (120-125 ग्राम) एवं कुल घुलनशील ठोस पदार्थ 4-5% जीवाणु जनित  मुरझा रोग के प्रति  प्रतिरोधी  तथा सिमित बढ़वार वाली किस्म हैं इसकी  रोपाई के 55-60 दिन बाद फल प्रथम तुड़ाई के लिए तैयार हो जाता हैं।    250-300  कुंटल  प्रति एकड़ होता हैं 

स्वर्ण नवीन:-  फल गहरे लाल रंग के अंडाकार (60-70 ग्राम) एवं कुल घुलनशील पदार्थ 5% जीवाणु झुलसा  रोग के प्रति प्रतिरोधी  तथा असिमित बढ़वार वाली किस्म हैं  इस किस्म की  रोपाई के 60-65 दिन बाद फल प्रथम तुड़ाई के लिए तैयार हो जाता हैं तथा उत्पादन  250-300  कुंटल  प्रति एकड़ होता हैं 
पूसा रूबी :- यह अगेती किस्म हैं , जिसके फल रोपाई के 60-65 दिनों बाद पक जाते हैं | फल हल्की धरियो वाले चपटे और सामान रूप से लाल होते हैं | इसकी उपज प्रति एकड़ 400-500 कुंटल होता हैं |

इसके अलावा भी अन्य किस्मे है जो अलग -अलग राज्य के लिए उपयुक्त हैं और उसका उत्पादन भी उसी राज्य में ज्यादा होता हैं , उन्नत  किस्म में - पूसा-120,पूसा शीतल,पूसा गौरव,अर्का सौरभ, अर्का विकास, सोनाली भी हैं जो पुरे भारत के लिए उपयुक्त हैं और इससे अधिकतम उपज प्राप्त होता हैं ,

संकर या हाइब्रिड :- इस प्रकार की किस्म में देशी किस्म के मुकाबले अधिक उत्पादन होता हैं संकर प्रकार के प्रमुख किस्म हैं। 
स्वर्ण वैभव :- फल गहरे लाल रंग के गोल (140-150 ग्राम) ठोस एवं कुल घुलनशील पदार्थ 5% दूरवर्ती बाजार और प्रसंस्करण के लिए उपयुक्त, एवं सिमित बढ़वार  वाली किस्म हैं  तथा रोपाई के 55-60 दिन बाद  प्रथम तुड़ाई के लिए तैयार हो जाता हैं इस किस्म की उपज उपज 360 -400 कुंतल प्रति एकड़ होता हैं। 
स्वर्ण समृद्धि:- फल लाल, ठोस (70-80 ग्राम) एवं कुल घुलनशील पदार्थ 5-6% जीवाणु जनित झुलसा रोग और अगेती अंगमारी रोगों के लिए प्रतिरोधी  एवं सिमित बढ़वार वाली किस्म हैं  रोपाई के 55-60 दिन बाद फल प्रथम तुड़ाई के लिए तैयार हो जाता हैं  उपज 400 -500 प्रति एकड़ तक होता हैं। 

इसके अलावा पूसा हाइब्रिड -2, पूसा हाइब्रिड-4, अविनाश-2, रश्मि तथा निजी क्षेत्र से शक्तिमान, रेड गोल्ड, 501, 2535उत्सव, अविनाश, चमत्कार, यू.एस.440 हैं जो बहुत अच्छी संकर किस्म हैं। 

घरेलु उपयोग के लिए घर की बालकनी या छतो में टमाटर उगाने की तकनीक :-

टमाटर का उपयोग हर घर में होता हैं क्योकि टमाटर एक ऐसा फल हैं जो लगभग सभी प्रकार की खाने का स्वाद बढ़ा देता हैं और इसी कारण से लोग टमाटर को पसंद करते हैं। कुछ लोग अपने जरुरत के लिए टमाटर को अपने ही घरो में उगाना चाहते हैं इसके लिए हम उन्नत तरीके से बालकनी या छतो में टमाटर उगाने के बारे में चर्च करेंगे :
बालकनी या छतो पर टमाटर उगाने के लिए  सबसे पहले  कम से कम एक फिट चौड़ा वा एक फिट  गहरा वाला गमला ले यदि गमला ना हो तो घर में पड़ी बेकार की प्लास्टिक  डिब्बा , या प्लास्टिक की छोटी-छोटी बाल्टी का भी प्रयोग कर सकते हैं , इन गमलो या डिब्बों में सबसे पहले नीचे 3-4 छेद कर दे जीससे अधिक पानी भर निकल जाये इसके बाद गमलो में अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट की खाद  को एक भाग मिटटी और एक भाग खाद के हिसाब से मिलाकर प्रत्येक गमलो में भर दे ध्यान रहे गमलो को अच्छे से दबा दबाकर भरे यदि गोबर या कम्पोस्ट की खाद ना मिले तो  केचुए की खाद को एक तिहाई मिटटी में मिलाकर भरे , मन लीजिये एक गमला एक किलो मिटटी लेगा तो उसमे 3 पाव मिटटी और एक पाव केचुए की खाद मिलाये , इसके बाद इस गमलो को एक से दो दिन के लिए खुले धुप में अच्छे से सुखाये फिर , इसके बाद प्रति गमला 2-4 बीज  एक से दो सेंटीमीटर की गहराई में डाले और हल्का सिचाई कर दे सिचाई प्रत्येक 4-5 दिन में करते रहे और हल्का करे , इसके अलावा ध्यान रहे पौधे को कम से कम सुबह या शाम में 2-3 घंटा धुप पड़े इससे पौधे का विकास अच्छा होता हैं साथ ही में फूल फल अच्छा आता हैं , ध्यान रहे यदि पौधे का विकास ना हो या फिर पत्तियों में पीला पन आए तो हल्के मात्रा में यूरिया का छिड़काव कर सकते हैं। 


टमाटर की  उन्नत एवं व्यावसायिक खेती कैसे करे ?:-
टमाटर की उन्नत और व्यावसायिक खेती करने के लिए :- जलवायू , भूमि , उन्नत किस्मे , और बाजार मांग इन चारो बातो  को ध्यान में रखना जरुरी हैं , यदि इनमे से किसी भी एक की जानकारी  नहीं हैं तो टमाटर की खेती से अच्छी लाभ कामना मुश्किल हो जायेगा , टमाटर उन्नत खेती के लिए सामन्य जानकारी 

टमाटर की खेती के लिए जलवायु :-

 टमाटर की  खेती बरसात , ठण्ड और गर्मी तीनो ही मौसम में   किया जाता लेकिन टमाटर की अच्छी उपज  के लिए नवम्बर महीने के अंतिम सप्ताह से लेकर दिसम्बर के अंतिम सप्ताह तक रोपाई करने से उपज में कोई परेशानी नहीं होता हैं , टमाटर की फसल अधिक पानी वा गर्मी से वृद्धि नहीं कर पाता  जबकि  पाला को बिल्कुल ही सहन नहीं कर सकता हैं।  12-26 से. ग्रे. तापमान के बीच टमाटर की खेती बहुत अच्छे से किया जा  सकता हैं। 

टमाटर की खेती के लिए उपयुक्त भूमि :-

टमाटर की खेती जैविक पदार्थो से युक्त दोमट मिटटी सबसे अच्छा होता हैं लेकिन अगेती किस्मो के लिए बलुई तथा दोमट बलुई मिटटी बहुत अच्छा होता हैं , इसके अलावा यदि अच्छी खाद जल निकास वा सिचाई की अच्छी व्यवस्था हो तो लगभग सभी प्रकार की मिटटी में टमाटर की खेती आसानी से किया जा सकता हैं। 

टमाटर की पौध शाला की तैयारी :-

टमाटर की बीज को  सीधे खेत में  बोकर भी फसल लिया जा सकता हैं किन्तु यह विधि बहुत छोटे एरिया के लिए लाभकारी हैं , यदि बड़े क्षेत्र में टमाटर उगाना हैं तो सबसे पहले पौधा तैयार करना पड़ता हैं जिससे पुरे खेत में पौधों की संख्या सही हो , टमाटर की पौधे तैयार करने के लिए सबसे पहले चयनित स्थान को अच्छे से जुताई करके या गुड़ाई करके मिटटी  को भूभुरा बना ले , और  इसमें सड़ी हुई गोबर की खाद मिला दे और मिटटी को समतल कर ले  फिर इसे 15 सेंटीमीटर ऊंचा क्यारी बना ले , इसके बाद 15-15  से. मी. की दुरी पर सीधा लाइन खींचे और इस लाइन में ही बीजो को रेत में मिलाकर बोवाई करे और फिर सूखी तथा बारीक़ किये गए गोबर की खाद से  या केचुए की खाद से बीज को ढक दे यदि खाद ना हो तो मिटटी से ही ढक दे और हल्के पानी का छिड़काव कर दे ,और हर 4-5 दिन में छिड़काव करते रहे , यदि हो सके तो पॉलीथिन की शीट से नीचे से  3 फिट ऊपर तक छत जैसे ढक दे इससे पौधे का Groth  अच्छा होता हैं। और पौधा 20 -25 दिन में  रोपाई के लिए तैयार  हो जाता हैं। 

टमाटर की फसल के लिए मुख्य खेत की तैयारी और खाद :-

टमाटर एक उथली जड़ वाली फसल हैं , अतः टमाटर की नर्सरी या पौध शाला में बीज बोन के बाद मुख्या खेत की तैयारी शुरू कर देना चाहिए जिससे खेत अच्छे से तैयार हो सके, इसके लिए खेत को एक बार मिटटी पलटने वाले हल से या फिर जो हल किसानो  के पास उपलब्ध हो उससे गहरी जुताई करना चाहिए उसके बाद खेत में प्रति एकड़ 3-4 ट्रैक्टर सड़ी हुई गोबर की खाद को पुरे खेत में अच्छे से फैला दे और 10-15 दिन तक ऐसे ही रहने दे इसके बाद दो जुताई करे और समतल कर ले यदि खेत में ढेले  हो तो ढेले तोड़ने के लिए रोटावेटर का प्रयोग कर सकते हैं इससे खेत की जुताई ,ढेले की तुड़ाई वा समतल एक साथ हो जाता हैं , इसके बाद खेत में 40 किलो ग्राम यूरिया , 160 किलोग्राम सिंगल सुपरफास्फेट , और 40 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश को एक एकड़ खेत के हिसाब से में सभी तरफ अच्छे से फैला दे  और एक हल्की जुताई कर दे अब खेत रोपाई के लिए तैयार हैं , ध्यान रहे जब रोपाई के 35-40 निराई गुड़ाई करे उसके बाद  40  किलो ग्राम  यूरिया का छिड़काव करे। 

टमाटर की ,बीज की मात्रा और रोपाई :-

एक एकड़ के लिए 120-150 ग्राम बीज  पर्याप्त होता हैं जबकि एक डिसमिल में 1-1.5 ग्राम बीज पर्याप्त होता हैं बीज को पौध शाला में बोन और वह से निकाल कर मुख्य खेत में लगाने  बाविस्टिन या थाइरम  दवा की 1 ग्राम मात्रा को 1 लीटर पानी में घोल बनाये वा उसमे पौधों की जड़ो को एक से दो मिनट के लिए डुबो दे और फिर मुख्य खेत में लगा दे इससे पौधे की गलने समस्या नहीं होता हैं। बरसात फसल के लिए जुलाई से अगस्त के दूसरे सप्ताह  तक , ठण्ड की फसल के लिए अक्टूबर से नवम्बर की अंतिम सप्ताह तक जबकि गर्मी की फसल के लिए फरवरी की पहली सप्ताह से मार्च की पहली सप्ताह तक टमाटर की रोपाई करे।  तथा पौधों की रोपाई लाइन  में करे और पौधों से पौधों की दुरी 20-30 सेंटीमीटर रखे तथा लाइन से लाइन की दूसरी 50-60 सेंटीमीटर रखे।  इसके अलावा यदि टमाटर में फूल लगते समय पौधों को सहारा दे दे तो उपज में 20 % तक वृद्धि होता हैं।  इसके लिए केन की रस्सी और बस का स्तेमाल कर सकते हैं। 

टमाटर में निराई गुड़ाई और सिचाई :- 

टमाटर की फसल को खरपतवार से बचाने और पौधों  की विकास के लिए दो निराई गुड़ाई की जरुरत होता हैं , पहला निराई गुड़ाई रोपाई के 30-35 दिन के बीच  लेना चाहिए  इसके ठीक 25-30 दिन में दूसरी निराई गुड़ाई कर लेना चाहिए , इसके आलावा पौधो की कटाई छटाई भी कर सकते हैं इससे पौधों में अच्छी वृद्धि के साथ अच्छी फल देने वाली शाखा भी निकलता हैं , जबकि सिंचाई  पौधे की रोपाई के बाद यदि मिटटी में पर्याप्त नमी ना हो तो तुरंत हल्की सिंचाई करना चाहिए  इसके बाद   बरसात के फसल में यदि वर्षा ना हो तो सिंचाई जरूर करे जबकि अक्टूबर से फरवरी तक की फसल को 7-12 दिन के अंतराल  वा गर्मी की फसल को 4-7 दिन के  अंतराल पर सिंचाई करना चाहिए , वैसे मुख्या रूप से सिंचाई का अंतराल भूमि की किस्म पर निर्भर करता हैं ,यदि हल्की मिटटी हुई तो जल्दी -जल्दी सिंचाई की जरुरत होता हैं जबकि भारी मिटटी में कम सिंचाई की जरुरत होता हैं। 

टमाटर की फसल सुरक्षा :-

टमाटर की फसल को कई प्रकार की कीट वा बीमारी नुकसान पहुंचाता हैं जिसका रोकथाम समय पर नहीं किया गया तो उपज में 60 प्रतिशत तक कमी देखा गया हैं ,

टमाटर की फसल को नुकसान पहुंचाने वाले प्रमुख कीट में :- जैसिड , सफ़ेद मक्खी और फल छेदक किट हैं :- 

जैसिड :- ये हरे रंग के छोटे -छोटे सफेद कीड़े होते हैं जो पौधे की कोशिका से रस चूस लेते हैं जिसके कारण पौधे की पत्तियाँ सूख जाती हैं , कीड़ो के अधिक संख्या होने से पत्तियाँ मुड़ कर गुछे जैसे हो जाते हैं और अंत में पीला पड़कर गिर जाता हैं ,
सफेद मक्खी :- ये सफेद रंग के छोटे-छोटे मक्खी के तरह दिखने वाले किट होते हैं जो पत्ती वा पौधे का रस चूसते हैं, इसके अलावा ये कीट पत्ती मुड़ने वाले बीमारी भी फैलाती हैं | इस कीट से प्रभावित पत्तियाँ मुरझाकर सुख जाता हैं |

फल छेदक कीट :- यह टमाटर का सबसे प्रमुख शत्रु कीट हैं , टमाटर की फल को खाकर बेकार कर देता हैं , इन कीड़ो का पहचान फलो की मोजूद छेदों से होती हैं इस कीट की इल्लिया हरे फलो में घुस जाता हैं और अन्दर ही अन्दर फलो को खाते हैं जिससे फल सड़ जाता हैं ,


उपरोक्त कीटो की रोकथाम समय पर करना बहुत जरुरी हैं नही तो उपज में भारी कमी होता हैं , फसल की बढ़वार की आरंभिक अवस्था में मक्खी वा जैसिड के रोकथाम के लिए यदि हो सके तो जैविक दवाई जैसे की विजया 666 , या जोस B5 , आदि , या फिर मेटासिटोक्स अथवा या डाईमेथड दावा का 2 ग्राम दावा को 1 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें तथा टमाटर के फल छेदक कीट का नियत्रण करने के लिए प्रभावित पौधों और फल को उखाड़ कर जला दे  यदि कीड़ो का गंभीर आक्रमण हुवा हैं तो जैविक दवाई विजया 666 या रासायनिक दवाई मेलाथियन अथवा कार्बोरिल का छिडकाव करे और 15 दिन बाद दुबारा छिडकाव करे ,इससे फल छेदक कीट का नियत्रण हो जाता हैं ,


टमाटर की फसल को प्रमुख रूप से विगलन और सुत्रक्रिमी ज्यादा नुकसान पहुचता हैं :-

टमाटर में विगलन रोग सबसे ज्यादा होता हैं तथा टमाटर के पौधों पर बहुत ज्यादा बुरा प्रभाव डालता है इस रोग से फसल को क्यारी या पौध शाला में सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचता है खासतौर से बरसात के मौसम में इसका आक्रमण बहुत ही गंभीर होता है,यह रोग पौधों में जमीन की सतह से शुरू होकर तने की निचली सतह तक दिखाई देता है जिसमें  जड़ वा तना मर जाता है तथा पौधे की ऊपरी सतह हरी अवस्था में होता है लेकिन पौधे गिर जाने के करण  नष्ट हो जाते हैं क्या रोग बहुत ही तेजी से फैलने वाला होता हैं, इस बीमारी का लक्षण मुख्य खेतों में भी देखा जाता है कई बार अधिक वर्षा या अधिक सिंचाई के कारण मिट्टी में अधिक नमी हो जाता है जिसके कारण भी  यह रोग यह दिखाई देते हैं, 

 इस रोग की रोकथाम के लिए बीज उपचार करना बहुत जरूरी है क्योकि यह  रोग अधिक नमी होने के कारण  फफूंद द्वारा फैलता है,  जब बीजों का उपचार कर दिया जाता है तो अधिक नमी होने की स्थिति में भी फफूंद  जीवाणु का विकास नहीं हो पाता है जिसके कारण पौधे रोग मुक्त हो जाते हैं, बीज उपचार करने के लिए थोड़ी सी दवा कैप्टन या थैरम की थोड़ी सी मात्रा को बीज के  साथ मिलाकर अच्छे से मिला ले इससे दवाई का कड़ बीज पर आसानी से चिपक जाएगा और फिर से इसे कम से कम 15 मिनट के लिए छाया में सुखा दें उसके बाद बीजों की बुवाई कर दें,  इसी प्रकार से पौधों को क्यारी से निकालने के बाद मुख्य खेतो में लगाने से पहले कैप्टन या बाविस्टिन कि 1 ग्राम दवा को 1 लीटर पानी में घोल बना लें और उसमें पौधों की जड़ों को कम से कम 10 मिनट के लिए डुबो दे  उसके बाद पौधों की रोपाई करें इससे जड़ गलन  की समस्या लगभग समाप्त हो जाता है, इसके अलावा यदि खेत में इस बीमारी का कोई लक्षण  दिखाई दे तो  प्रभावित पौधों को उखाड़कर जला दे ,इसके अलावा फसल चक्र ,वा जल निकास की अच्छी व्यवस्था करना चाहिये वा उचित मात्रा में ही सिचाई करे .

इसके अलवा सूत्रकृमि भी टमाटर की पौधों को बहुत हानी पहुचाता हैं , सूत्रकृमि के कारण पौधों की जड़ो में  बड़ी बड़ी गठ बन जाता हैं , जिससे पौधों का विकास रुक जाता हैं,  प्रभावित पौधों की पत्तिया पीली पड़ जाता हैं , इसकी रोकथाम के लिए बीज उपचार करना चाहिये वा फसल चक्र के साथ खेत को कुछ समय के लिए खाली छोड़ दे इससे सूत्र कृमि की जीवन चक्र प्रभावित होता हैं , 


टमाटर की उपज प्रति एकड़ :

टमाटर की फसल को अच्छी देखभाल करने से वा अच्छी उपयुक्त किस्मो के चुनाव से एक एकड़ से सामन्य टमाटर से 150-200 कुंटल तक उपज आता हैं जबकि चेरी टमाटर से प्रति एकड़ 300-400 कुंटल तक उत्पादन होता हैं ,


टमाटर की उन्नत खेती और लाभ 

 

अच्छे क्वालिटी के बीज  160 ग्राम        1500 रूपए

पौध शाला निर्माण और पौधे तैयार करना    2000 रूपए

खेत की जुताई  व समतल करना          4000 रूपए

खाद सड़ी हुई गोबर या कम्पोस्ट की खाद    5500 रूपए

     सिंगल सुपर फास्फेट 2 बोरी         700 रूपए

     मियुरेट ऑफ़ पोटाश 30 किलो ग्राम    600 रूपए

     यूरिया 70 किलो ग्राम               600 रूपए

     खाद डालने के लिए मजदूरी          500 रूपए  

पौध रोपाई और निराई गुड़ाई के लिए      10000 रूपए

सिचाई और कीटनाशक के लिए            6000 रूपए

पौधों को सहारा देने के लिए             10000 रूपए

लकड़ी वा रस्सी को लगाने के लिए मजदूरी   1000 रूपए

अन्य खर्च                            2000 रूपए

 


एक एकड़ में कुल खर्च                 44,400 रूपए

 


 शुद्ध आय:-   

 एक एकड़ से अच्छे से देख भाल करने से 120 कुंटल टमाटर बड़े

 ही आराम से आ जाता हैं , यदि बाजार में एक एवरेज भाव

8 रूपए प्रति किलो के हिसाब से बेचा जाये तो

 

120*100  =12000 किलोग्राम, 12000*8 = 96000 का कुल बिक्री

 

          कुल आय - कुल खर्च ,  96,000-44,400 = 51600

 

अतः एक एकड़ से 51600 रूपए शुद्ध कमा सकते हैं

 

 

टमाटर की खेती से अधिकतम लाभ कमाने के लिए navjiwankrishi.blogspot.com का सुझाव :-

टमाटर की खेती से लाभ कमाना तभी संभव हैं जब खेती की कुल उत्पादन लगत कम से कम हो और उत्पादन का मूल्य अच्छे से अच्छे मिले , किसान अक्सर एक गलती करता हैं की वह किसी भी फसल को एक सीज़न में बहुत अधिक उगाता हैं वो भी ऐसे समय में जब वह खेती करने वाले कई किसान उसी फसल को लगा रहे हैं , ऐसे में फसल का अधिक उत्पादन होने के बावजूद  किसान को कोई फायदा नही होता क्योकि अधिक उत्पदान से उस उत्पाद का मूल्य घट जाता हैं , मैं यह कुछ उद्धरण देना चाहूँगा , यदि खाद ,बीज , सीमेंट, लोहे,आदि की बड़ी बड़ी कम्पनी अपने उन उत्पादों को अधिक से अधिक उत्पादन करने के क्षमता के बावजूद नही बढ़ाते हैं , क्योकि यदि वो ऐसा कर दे तो उनके उत्पादन के लगत तो वही होगा जो कम उत्पादन करने में भी खर्च हो रहा था , लेकिन अधिक उत्पादन के करण उन उत्पादों का मूल्य बहुत कम हो जायेगा जिससे कम्पनी को शायद अपना उत्पादन लागत भी ना वसूल हो पाए ,और इसलिए अपने उत्पाद तो कम रखते हैं जिसके कारण उनका सामान का अच्छा भाव मिलता हैं ,

ठीक ऐसे ही किसान अपने उत्पाद का अच्छा भाव पाने के लिए अपने उत्पाद को स्थिर रखे , और एक ही फसल लगाने के बजाये दो या जितना हो सके अधिक से अधिक मिक्स फसलो को उगाये , जैसे कुछ क्षेत्रा में टमाटर तो कुछ में आलू ,तो कुछ में मिर्च , हरी सब्जी , इससे सभी खेतो का उपयोग अच्छे से होता हैं और उत्पाद का भाव भी अच्छा मिलता हैं , इसके अलावा अपने उत्पाद को अच्छे बाजार भाव मिलने पर बाजार में सीधे बेचे ,यदि बाजार भाव सही नही हैं तो  उस उत्पाद को नए उत्पाद में बदलकर बेचना चाहिये जैसे की , यदि टमाटर का बाजार मूल्य गिर गया हैं लेकिन इसे अधिक दिनों तक रख भी नही सकते ऐसे में , टमाटर की सॉस , केचप ,टमाटर की मिक्स आचार , टोमेटो पावडर , बना कर बेचे इससे  टमाटर को लबे समय तक खाने योग्य रखा भी जा सकता हैं और लोगो को काम भी  मिलेगा  साथ में जो चीज कम भाव में बिक रहा था अब उसका प्राइस एक निश्चित हो जायेगा जिससे किसानो को अच्छा मुनाफा होगा .

टमाटर की सॉस  बनाने की विधि 

टमाटर की सॉस  बनाने की विधि बहुत आसन व बहुत कम सामग्री में तैयार होने वाला उत्पाद हैं 

1 किलो ग्राम अच्छे  पके तजा टमाटर ,एक बड़ा चम्मच सिरका (वेनेगर),200 ग्राम चीनी,आधी छोटी चम्मच सोंठ पाउडर (अदरक को सुखाकर उसका पिसा पाउडर. यह बाजार में भी उपलब्ध है) स्वादानुसार काला नमक

 बनाने की विधि 

टमाटर  को अच्छे से धोकर काट लें. (इस ट्रिक से छीलें टमाटर, आलू और संतरा, काम होगा आसान)- एक बर्तन/भगोने में थोड़ा पानी और टमाटर डालकर मध्यम आंच पर उबलने के लिए रख दें. ढक्कन से भगोने को ढक दें और बीच-बीच में एक बड़ी चम्मच से टमाटर चलाते रहें. जब टमाटर पककर अच्छे से नर्म हो जाएं तो आंच बंद कर दें. फिर बड़ी छलनी को एक बर्तन के ऊपर लगाकर उस छलनी से पके टमाटर को चम्मच से दबाकर अच्छी तरह छान लें और उसका गाढ़ा रस अलग कर लें. अगर टमाटर के पीस बचे रह जाते हैं तो इनको मिक्सर में डालकर पीसने के बाद छलनी से छान लें.- आप चाहें तो टमाटर को निकालकर इनका छिलका उतारने के बाद भी मिक्सर में पीस सकते हैं. इनके बीज निकाल देंगे तो और अच्छा रहेगा. ऐसा करने के लिए आपको टमाटर काटने की जरूरत नहीं होगी, अब टमाटर के गाढ़े रस को एक भरी तले के बर्तन में डालकर मीडियम आंच पर रखें.- इसमें चीनी, सोंठ,  और काला नमक डालकर कड़छी या चम्मच से लगातार चलाते हुए पकाएं| जब यह गाढ़ा हो जाए तो आंच बंद कर दें. टोमैटो सॉस ठंडा होने के बाद इसमें सिरका  (वेनेगर) डालकर मिक्स करें.- तैयार सॉस को जार में भरे और मोम से शील बंद कर दे , इसप्रकार से इसे 6 महीने तक स्टोर कर सकते हैं |

टमाटर केचप बनाने की विधि 

टमाटर की केचप बनाना सास बनाने जैसे ही लेकिन इसमें कुछ मसालों का प्रयोग किया जाता हैं जिससे यह सास के मुकाबले अधिक स्वादिष्ट होता हैं .

 सामग्री 

1 किलो ग्राम टमाटर , लौंग बिना फुल ,0.5 ग्राम  , बड़ी इलाइची 1 ग्राम  ,काली मिर्च1 ग्राम ,लाल मिर्च 1 ग्राम ,जीरा 1 ग्राम ,जैवित्री 1 ग्राम  , दालचीनी 1.5 ग्राम  ,लहसुन 5 ग्राम  ,प्याज20 ग्राम , शक्कर 100 ग्राम  , नमक 10 ग्राम  ,सोडियम बेन्जोइड750 मिलीग्राम  , सिरका 4 मिलीग्राम 

बनाने की विधि 

पके हुए टमाटर को धोकर काट ले , इसके बाद एक बर्तन में टमाटर को  इतना पकाए की छिलका, गुदा  वा बीज आराम से अलग हो जाये  इसके बाद इसे स्टील की छलनी में बीज वा छिलका को छान कर अलग कर दे वा गुदा और रस में शक्कर ,नमक को मिलाकर धीमी आंच में लगभग 10 मिनट पकाए सभी मसालों को एक साथ  कूट कर मलमल की कपडे में पोटली बांधे अब इसे पकते हुए टमाटर के रस में डाल दे 5 मिनट तक पकाए और फिर पोटली को बहर निकाले  अब इसमें सोडियम बेंजोइड , और सिरका को मिलाये , और फिर 1 मिनट तक पकाए इसके बाद गरमा गरम साफ बोतल या डिब्बे में भरे और मोम से शील बंद कर दे इसे साल भर बाजार में बेचा जा सकता हैं ,

टमाटर की मिक्स आचार 

केवल टमाटर का आचार अधिक दिनों तक नही टिक सकता हैं इसलिए लबे समय तक टमाटर का आचार खाने के लिए मिक्स आचार बनाना सबसे आसान और उपयोगी हैं , टमाटर का मिक्स आचार बनाने के लिए -

सामग्री 

अच्छे से पके 1 किलो नीबू , 200 ग्राम सब्जी वाली हरी मिर्ची , 100 ग्राम लहसुन , 1 किलो अच्छे पके टमाटर , 200 ml सरसों का तेल , 50 ग्राम नमक या स्वाद के अनुसार भी लिया जा सकता हैं , 50 ग्राम भुजा गया सरसों की दाल , 30 ग्राम लाल मिर्च पाउडर , हल्दी पाउडर 50 ग्राम , 20 ग्राम जीरा , 10 ग्राम मेथी , 10 मिलीग्राम सिरका ,

बनाने की विधि :-

नीबू वा टमाटर को साफ धोकर 4 टुकड़ो में काट ले , और नीबू की दाना को निकाल ले , यदि हरी मिर्ची लबी हो तो 4 टुकडो में काटे नही तो 2 टुकडो में काटे , लहसुन को साफ कर ले अब तेल और सिरका को छोड़कर सभी सामग्री को एक साथ मिला दे और इसे साफ डिब्बो में भर दे इसके बाद सरसों के तेल और सिरका को डाल कर अच्छे से मिक्स करे , और डिब्बे को मोम से शील बंद करके ढक्कन कस दे , और इसे 2-3 दिन हल्के धुप में रखे , अब यह बाजार में बेचने के लिए तैयार हैं , 

टमाटर का पाउडर 

अच्छे पके टमाटर को साफ कर ले और इसे छोटे छोटे टुकडो में काटे और तार की जाली ,या फिर बास की टाट में डाल कर कड़े धुप में सुखाये , अच्छे धुप में 5-7 दिन सुखाने के बाद , सूखे टमाटर की पिसाई कर दे और इसमें हल्का नमक या फिर सोडियम बेंजोइड का पावडर मिलाए प्रति एक किलो में 500 मिलीग्राम के हिसाब से और फिर इसे तुरंत डिब्बो में या पोलीथिन में पैक कर दे , अब यह मार्केट में बेचने के लिए तैयार हैं , 

टमाटर पाउडर का इस्तेमाल विभिन्न मसाले दार सब्जियो में , नमकीन बनाने में , चटनी बनाने में , इसके अलावा कई प्रकार की रोटी बनाने वाले आटे में  मिलाकर रोटी बनाई जाये तो बहुत ही स्वादिष्ट रोटी बनता हैं |

यदि टमाटर उगाने वाले किसान Organic Tomato की Cultivation करता हैं तो  लाखो कमा सकता हैं   और किसान  अपना उत्पाद को सक्षण करके बेचे तो अधिक लाभ कमा सकता हैं , बाजार  इस तरह के उत्पाद की मांग लगातार बढ़ रहा हैं ऐसे में इस प्रकार की खेती से बहुत अच्छा लाभ कमा  सकते हैं 


 तीखुर की खेती से कमाए लाखो रूपए प्रति एकड़ || जीरा की जैविक खेती || मेथी की जैविक खेती || धनिया की जैविक खेती || जैविक खेती कैसे करे || जैविक खेती के लिए Bio Nutrient || कैसे रसायन मुक्त खेती करे  ||  किसान क्रेडिट कार्ड कैसे बनाये || किसान सम्मान का लाभ किसान कैसे ले


Cultivation Of Teekhur 

 स्वास्थावार्धक तीखुर की खेती और लाभ 

तीखुर , जंगली रूप से उगने वाला , पौधा हैं जिसकी पत्तिया हल्दी की पत्ती की तरह होता हैं ,  और हल्दी की तरह ही इसकी कंदो का उपयोग किया जाता हैं ,किन्तु इसमें फुल नीले सफ़ेद रंग के लगते हैं तथा कंद सफ़ेद रंग का होता हैं , वैसे तो तीखुर बहुत  स्वस्थावार्धक होता हैं , और अब इसकी खेती भी कर रहे हैं जो बहुत लाभकारी सिद्ध हो रहा हैं। 

·      तीखुर का उपयोग

·      तीखुर खाने के फायदे या औषधि गुण

·      तीखुर की खेती कैसे करे

·      तीखुर की प्रसंस्करण कैसे करे

·      बाजार से तीखुर खरीदते समय सावधानिया

·           

 

भारत में तीखुर को अन्य नामो से भी जाना जाता  हैं जो इस प्रकार से हैं :-

वानस्पतिक नाम :- करकुमा एन्गस्टीफोलिया 
कुल :- जिंजीबरेशी 
Hindi- तीखुर, तवाखीर, अरारोट (Teekhur or Tikhur) 
Sanskrit- तवक्षीर, पयक्षीर, यवज, तालक्षीर
English- Indian arrowroot (इण्डियन ऐरोरूट), बोम्बे ऐरोरूट (Bombay arrowroot), ईस्ट इण्डियन एरोरूट (East Indian arrowroot), कुरकुमा र्स्टाच (Curcuma starch), नैरो लीव्ड् टरमरिक (Narrow leaved turmeric)
Oriya- पलुवा (Paluva)
Kannada- कोवीहिट्टू (Koovehittu)
Gujarati- तेवखरा (Tavakhara)
Tamil- अरारूट्किलेन्गु (Ararutkilangu), कुआकिलंकू (Kuakilanku) 
Telugu- अरारूट्-गाड्डालू (Ararut-gaddalu)
Bengali- टीक्कुर (Tikkur)
Nepali- बारखी सारो (Baarkhe sarro)
Marathi- तेवाखिरा (Tavakhira)
Malayalam- कूवा (Koova), कुवा (Kuva)
Arabic- तवक्षीर (Tavaksheer)


तीखुर के उपयोग :-

पहले लोग तीखुर की कंदो को खुदाई करके साफ करते थे फिर उसे पत्थर से  गीस - गिस कर मांड बनाते थे जिसे बाद में सुखाकर रख लेते थे और जब जरुरत पड़ता था तो उसे पीस कर आसानी से उपयोग कर सकते हैं , वर्तमान में तीखुर की घिसाई वा सफाई मशीन से होता हैं , जिससे कम समय में अधिक  मांड का निर्माण कर सकते हैं , जिसे  खाने योग्य तीखुर में बदला जाता हैं , तीखुर का उपयोग कई प्रकार से किया जाता हैं जैसे की खाने में तीखुर की बर्फी बनाकर  तीखुर की हलुवा बनाकर , जलेबी , लड्डू बनाकर, गर्मियों में शरबत बनाकर पीने के लिए उपयोग किया जाता हैं,   इसके अलावा तीखुर का उपयोग कई प्रकार की त्वचा रोग के उपचार में भी किया जाता हैं खासतौर से चेहरे की चामक बढ़ाने में |

तीखुर के औषधि गुण और खाने के फायदे :-

तीखुर हल्दी के जैसा ही होता है, और हल्दी के फायदे की तरह ही तीखुर के सेवन से शरीर को बहुत  लाभ होता है। आयुर्वेद के अनुसार, तीखुर एक जड़ी-बूटी है, और तीखुर के अनेक औषधीय गुण हैं। जैसे घाव, बुखार, खांसी, सांसों की बीमारी, अधिक प्यास लगने की समस्या में तीखुर के इस्तेमाल से फायदे  मिलते हैं। इतना ही नहीं, एनीमिया, मूत्र रोग, डायबिटीज, पीलिया  आदि रोगों में भी तीखुर के औषधीय गुण से लाभ मिलता है।

  • तीखुर स्टार्च का, गर्मियों में शरबत बनाकर पीने से लू से बचाव होता हैं 
  • तीखुर स्टार्च के सेवन से अल्सर तथा पेट से जुड़े कई विकार दूर होते हैं 
  • तीखुर की कंदों को पीसकर सिर में लेप लगाने से सिर दर्द ठीक हो जाता हैं 
  • तीखुर स्टार्च पोषक तत्वों एवं औषधि गुणों से परिपूर्ण तथा सुपाच्य होने के कारण कमजोर व पोषित बच्चो को खिलाने हेतु अच्छा माना गया हैं 

तीखुर की खेती :-

पहले लोग सिर्फ जंगलो में बारिश के मौसम में उगने वाले तीखुर को ही एकत्र करते थे और उपयोग में लाते थे किन्तु वर्तमान में तीखुर की मांग सिर्फ भारतीय बाजारों में ही नही विदेशो में भी मांग होने से इसकी खेती की आवश्यकता को महसूस किया गया हैं , किसान तीखुर की खेती करके अपनी आमदनी में अच्छा वृद्धि कर सकते हैं साथ ही  बाजार मांग को काफी हद तक पूरा करने में मदत कर सकता हैं , तीखुर पर अभी कोई खास कृषि अनुसन्धान नही हुवा हैं जिसके कारण तीखुर का कृषि क्षेत्र बहुत कम हैं, वा उत्पादन भी  सिमित हैं , नीचे दिए जा रहे जानकारी का उपयोग करके किसान तीखुर की खेती कर सकता हैं :

जलवायु :- 

किसी भी फसल को उगाने के लिए जलवायु का बड़ा ही महत्व होता हैं , जिससे फसल का उत्पादन में बहुत फर्क पड़ता हैं , तीखुर की पौधा  प्रयः छायादार स्थान में उगता हैं जिसका उत्पादन अच्छा होता हैं किन्तु , ऐसा देखा गया हैं की खुले स्थान पर तीखुर की खेती करने से छाया वाले स्थान के मुकाबले अधिक उत्पादन होता हैं , तीखुर का उत्पादन साल में केवल खरीफ के मौसम में ही किया जाता हैं , ऐसे स्थान जहा की वार्षिक वर्षा 800-1200 मिलीमीटर हो आसानी से किया जा सकता हैं , 

भूमि या मिट्टी   :-

 किसी भी प्रकार की फसल के लिए सबसे पहली जरुरत होता हैं उपयुक्त मिट्टी जिसमे जल धारण क्षमता अच्छा हो तथा पानी की उचित निकासी के साथ-साथ अच्छी मात्र में जीवांश भी होना चाहिये , और यह सब गुण बालुई दोमट या दोमट मिट्टी में बहुत अच्छे से पाई जाती हैं , किन्तु इस प्रकार की मिट्टी सभी जगह पर नही पाई जाती , फिर भी अच्छी जल ब्यवस्था और जल निकासी तथा जैविक खाद का प्रयोग करके किसी भी मिट्टी में किसी भी  फसल को आसानी से उगाया जा सकता हैं , ठीक ऐसे ही तीखुर की खेती को लगभग सभी प्रकार की मिट्टी में किया जा सकता हैं, जिसका पी.एच. मान 6.5-7.5 तक हो , अच्छा माना जाता हैं | 

खेत की तैयारी एवं खाद :-

चुकी तीखुर कंद वाली फसल हैं इसलिए मिट्टी का भुभुरा होना बहुत जरुरी हैं | इसके लिए मिट्टी पलटने वाले हल से एक गहरी जुताई करना चाहिये , उसके बाद 3-4 ट्रेक्टर अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति एकड़ पहले जुताई के बाद वा दूसरी जुताई के पहले खेत में फैला देना चाहिये और खेत को कम से कम 1 सप्ताह तक ऐसे ही छोड़ दे जिससे हानिकारक किट पतंगे नस्ट हो जाये  व मिट्टी अच्छे से सुख जाये, इसके अलवा नीम की खली 20-30 किलो ग्राम प्रति एकड़ डाल सकते हैं , इसके बाद  दो बार कल्टीवेटर या हेरो से जुताई करना चाहिये | उसके बाद खेत को समतल करके खेत की ढाल के अनुसार मेड बनाये जिससे बरसात का पानी ना भरे वा आसानी से खेत से निकल जाये , मेड से मेड की दुरी 50-60 सेंटीमीटर रखे |

उन्नत किस्मे वा बीजदर  :- 

जैसे की हमने ऊपर ही लिखा हैं की 2020 के अंत  तक तीखुर की खेती पर कोई विशेष कृषि अनुसन्धान नही हुआ हैं जिससे किसी उन्नत शील किस्मो का विकास नही हो पाया हैं तीखुर के खेती के लिए किसानो के आसपास के जंगलो में उगने वाले तीखुर के प्रकंदो का इतेमाल नई फसल को उगाने के लिए कर सकते हैं  , एक एकड़ के लिए 6-8 कुंटल कंदों की जरुरत होता हैं जिनका वजन लगभग 30-50 ग्राम होता हैं , कंदों को लगाने के पहले किसी भी फफूंद नाशक दवा ( कार्बेन्डाजिम ,या Bvestin ) 2-2.5  ग्राम दवा प्रति किलो कंद से बीज उपचार कर लेना चाहिये , इससे प्रकंदो का सडन नही होता हैं |

रोपाई का समय वा विधि :

तीखुर की रोपाई जून-जुलाई में करते हैं , तथा रोपाई मेड़ो में करना अच्छा होता हैं , इसमें कतार से कतार की दुरी 50-60 सेंटीमीटर वा पौधे से पौधे की दुरी 20 सेंटीमीटर होना चाहिये , 

निदाई गुड़ाई वा सिचाई  :- 

फसलो को खरपतवारो से मुक्त रखने के लिए रोपाई के 30-40 दिन में निदाई गुड़ाई वा मिट्टी चढ़ाई का काम कर देना चाहिये , इसके बाद 70-80 दिन बाद दूसरी बार मिट्टी चढाई का काम कर देना चाहिये , और फिर अंतिम मिट्टी चढ़ाई का काम 130-135 में कर लेना चाहिये , पानी ना गिरने की स्थिति में हल्की सिचाई जरुरी हैं मिट्टी में अत्यधिक नमी ना रखे |

फसल सुरक्षा :-

तीखुर की फसल पर कोई खास रोग या किट का प्रकोप नही देखा गया हैं फिर भी यदि फसल में कोई रोग का लक्षण दिखे तो प्रभावित पौधे को उखाड़कर नष्ट कर दे | और वही कीड़ो का प्रकोप दिखे तो कीड़े मारने वाले हल्की दवाई का प्रयोग करे |

कंदों की खुदाई :-

तीखुर की फसल अवधि 6-7 महीने की होती हैं ,तथा पत्तियो के सूखने के बाद कंदों की खुदाई करना चाहिये और फिर इसे छायादार स्थान में फैला कर सुखना चाहिये , इसके बाद प्रसंस्करण की प्रक्रिया करना चाहिये 

प्रसंस्करण की विधि :-

तीखुर की  खुदाई के बाद उसे स्टार्च में बदलना होता हैं जिसका उपयोग विभिन्न प्रकार से किया जाता हैं , तीखुर को स्टार्च में बदलने के लिए देशी और मशीनी विधि का प्रयोग किया जाता हैं |

देशी विधि :- इसमें तीखुर के प्रकंदो को साफ धोकर फिर इसे खुरदुरे पत्थरों में टिन की चलनी के पीछे  घिसते हैं  जिससे एक तरल पदार्थ बनता हैं जिसे माड या स्टार्च कहते हैं जिसमे  दो गुने पानी  मिलाकर सूती कपडे की मदत से मिट्टी के मटके में छाना ले  , और फिर रात भर के लिए या 10-12  घंटे के लिए छोड़ दे इससे स्टार्च निचे बैठ जाता हैं 10-12 घंटे बाद मटके के उपरी पानी को निकाल दे और फिर से ताजा पानी डाल दे और फिर 10-12 घंटे के लिए रख दे यही प्रक्रिया 3-4 दिन करे उसके बाद मटके में जमे स्टार्च को चमच की सहयता से निकालकर 4-6 दिन तक अच्छे से धुप में सुखा कर उपयोग में या बेचने के लिए कर सकते हैं |

मशीनी विधि :- इसमें ग्राइडिंग मशीन का उपयोग किया जाता हैं जो बिजली से चलता हैं मशीन में घिसने के बजाय पीसकर स्टार्च निकाला जाता हैं , इसमें तीखुर की प्रकंदो को छोटे छोटे टुकडो में काट कर मशीन में डाल देते हैं जिसकी अच्छे से पिसाई हो जाता हैं , फिर जो माड या स्टार्च प्राप्त होता हैं उसमे दो गुने पानी  मिलाकर सूती कपडे की मदत से  छाना जाता हैं   , और 10-12  घंटे के लिए छोड़ दे इससे स्टार्च निचे बैठ जाता हैं 10-12 घंटे बाद  उपरी पानी को निकाल दे और फिर से ताजा पानी डाल दे और फिर 10-12 घंटे के लिए रख दे यही प्रक्रिया 3-4 दिन करे उसके बाद बर्तन के नीचे में जमे स्टार्च को चमच की सहयता से निकालकर सुखा ले, मशीन से सुखाने के लिए एक दिन ही काफी होता हैं , सूखने के बाद अच्छे से पैकिंग करके रख ले  | मशीन से स्टार्च प्रतिदिन 3-4 कुंटल कंदों से निकला जा सकता हैं जबकि देशी विधि में एक व्यक्ति एक दिन में 20-25 किलोग्राम कंदों से ही स्टार्च निकाल सकता हैं , एक किलोग्राम स्टार्च बनाने के लिए लगभग 8-10 किलोग्राम प्रकंदो की जरुरत पड़ता हैं |

मांड / स्टार्च का उपज :-

तीखुर की प्रकंदो के प्रसंस्करण से स्टार्च निकला जाता हैं , जिसमे कंदों से केवल 12-22 प्रतिशत तक स्टार्च निकलता हैं  जिसका बाजार मूल्य 150-300 रूपए प्रति किलो ग्राम होता हैं , यदि हम प्रकंदो की बात करे तो अच्छी देख रेख करने पर एक एकड़ में लगभग 7-8 टन यानि की 70- 80 कुंटल तक पैदावार होता हैं जिससे लगभग 700-800 किलोग्राम के बीच स्टार्च प्राप्त होता हैं |

बाजार से तीखुर खरीदते समय सावधानिया:-

बाजार से तीखुर खरीदते समय लोगो को सावधानी बरतने चाहिए क्योकि तीखुर के सामान ही दिखने वाले दुसरे चीज भी मौजूद हो सकता हैं क्योकि तीखुर का स्टार्च ह्ल्क सफ़ेद रंग का होता हैं , तथा यह कठोर होता हैं , लेकिन बाजार में हो सकता हैं इसका पिसा हुआ माल मिले, जिसमे मिलावट किया जा सकता हैं , इसलिए बाजार से तीखुर ठोस रूप में ही ख़रीदे जिसे बाद में मिक्सी या किसी अन्य उपकरण से जरुरत के हिसाब से पीस कर उपयोग किया जा सके |

तीखुर स्वस्था के लिए बहुत ही लाभकारी हैं , साथ ही किसानो के लिए भी बहुत लाभकारी हैं , इसलिए लोगो को तीखुर का सेवन करना चाहिये , और किसानो को अपने बेकार पड़े जमीनों में तीखुर की खेती करना चाहिये वो भी जैविक रूप से क्योकि आज कल किसानो के द्वारा अन्धाधुन रासायनिक खाद का प्रयोग कर रहे हैं जो लोगो की सेहत को बहुत ही बुरा प्रभाव डाला हैं , जिसकी वजह से केंसर हार्ट अटेक , लोकवा , जैसे परेशानी का सामना करना पड़ रहा हैं , अतः आप सब से निवेदन हैं जी जैविक अपनाये |

यदि तीखुर की खेती से किसानो को होने वाले आय :-

यदि तीखुर की खेती से किसानो की प्रति एकड़ आय की बात करे तो बहुत अच्छा हैं यदि किसान खुद से तीखुर की बीज की ब्यवस्था कर ले तो बहुत ही अच्छा आमदनी हो सकता हैं क्योकि कुल ब्याय का 50 प्रतिशत केवल बीज के लिए ही खर्च हो जाता हैं , जबकि तीखुर की फसल पर बहुत ही कम किट ,बीमारी का प्रकोप होता हैं या नही भी होता हैं  जिससे कीटनाशक , दवाई का खर्च पूरा बच जाता हैं ,


बीज की  मात्र 700 किलोग्राम          प्रति किलो 40 रूपए 700  =28000  

                                 

गोबर की खाद 4 ट्रेक्टर , प्रति ट्रिप            2500रूपए*4=10000

रूपए

खेत की जुताई 1000 प्रति घंटा                1000*3  =3000 रूपए  

मेड बनाना, बीज रोपाई , निराई गुड़ाई, सिचाई  के लिए मजदूरी 10000

स्टार्च बनाने में खर्च प्रति किलो  300 रूपए       700*30 =21000

अन्य खर्चो के लिए                                   2000

 

कुल खर्च   74000

 

आय 700 किलोग्राम स्टार्च , 200 रूपए प्रति किलो ग्राम , 700*150

=1,05000

1,05000-74000  =शुद्ध आय 31000 रूपए प्रति एकड़  

 


Translate

 PM-किसान सम्मान निधि 

के लिए 

ऑनलाइन आवेदन करे 

किसान क्रेडिट कार्ड 

के लिए 

ऑनलाइन आवेदन करे 

 प्रधान मंत्री फसल बीमा 

के लिए 

ऑनलाइन आवेदन करे 

Importance Of Link

https://navjiwankrishi.blogspot.in/p/all-in.html

https://navjiwankrishi.blogspot.com/p/blog-page_16.html



    
==============================
              





Popular Posts